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Showing posts from November, 2025

कि-019 जिसको बुरा समझा

जिसको बुरा समझा वो अच्छा निकला, जिसको अच्छा समझा वो बुरा निकला, यह उलट फेर है किस्मत का "अजनबी", तूने सोचा था क्या और वो क्या निकला। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-022 कुदरत का दस्तूर है

कुदरत का यह दस्तूर है, घमंड कितना भी बड़ा हो,  एक ना एक दिन टूटता ज़रूर है। और जिस दिन घमंड ये टूटता है उस दिन, अपने किये का पश्चाताप होता ज़रूर है। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-021 अत्यंत संवेदनशील

अत्यंत संवेदनशील और भावुक रहता था, ज़माने को देखके क्या से क्या हो गया हूँ मैं। मैं भी क्यों रहूं कुछ अलग सा, "अजनबी", बस यही सोचके ढीठ और बेहया हो गया हूँ मैं। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-016 कभी वक़्त न लगा

कभी वक़्त न लगा था तुमसे दिल लगाने में, मगर उम्र गुज़र रही है अब तुम्हे भुलाने में। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-020 तुझी में दुनियां की

तुझी में दुनियां की हरेक ख़ुशी देखता हूं, तुझी में आसमाँ, तुझी में  ज़मीं देखता हूँ। बहुत बेताब हो जाता हूँ मैं तेरे लिए, जो सब्र तुझमें है, वो ख़ुद में नहीं देखता हूँ। -वीरेंद्र  "अजनबी"

पं-015 ख्वाबों को हक़ीक़त

ख्वाबों को हक़ीक़त बनते देखा हमने, और हक़ीक़तों को ख्वाब भी बनते देखा हमने। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-014 लूटना था तो पिस्तौल

लूटना था तो पिस्तौल दिखाकर लूट लेते, मोहब्बत जता कर क्यों लूटा यार तुमने। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-019 मैं भी अजब इंसाँ हूँ

मैं भी अजब इंसाँन हूँ,  तजुर्बे ही करता जाता हूँ, बस तजुर्बे पर तजुर्बे, कोई इब्रत ली नहीं मैंने। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-013 दाद देने का इस कदर

दाद देने का इस कदर हमे शुक्रिया न कीजिये, इतनी दाद तो हम आपके हमनामों को दे देते हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-012 एक बार को अच्छे

एक बार को अच्छे भले लोग याद ना भी आएं, मगर जाने क्यों बेवफ़ा लोग बहुत याद आते हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"

कि-018 है अंदाज़ तेरा

हाय अंदाज़ तेरा ग़ज़ल सुनाने का, दाएं-बांए देख के यूं मुस्कुराने का, छोड़ सकते हैं हम हर मसरूफियात, पर छोड़ेंगे ना मौका मुशायरे में आने का। -🆚"Ajnabi"

शे-068 याददाश्त दुरुस्त बादाम

याददाश्त दुरुस्त बादाम खाने से नहीं, धोखे खाने से होती है। मोहब्बत की आज़माइश मिलने से नहीं, बिछुड़ जाने से होती है। -वीरेन्द्र "अजनबी"