कुदरत का यह दस्तूर है, घमंड कितना भी बड़ा हो, एक ना एक दिन टूटता ज़रूर है। और जिस दिन घमंड ये टूटता है उस दिन, अपने किये का पश्चाताप होता ज़रूर है। -वीरेंद्र "अजनबी"
अत्यंत संवेदनशील और भावुक रहता था, ज़माने को देखके क्या से क्या हो गया हूँ मैं। मैं भी क्यों रहूं कुछ अलग सा, "अजनबी", बस यही सोचके ढीठ और बेहया हो गया हूँ मैं। -वीरेंद्र "अजनबी"
तुझी में दुनियां की हरेक ख़ुशी देखता हूं, तुझी में आसमाँ, तुझी में ज़मीं देखता हूँ। बहुत बेताब हो जाता हूँ मैं तेरे लिए, जो सब्र तुझमें है, वो ख़ुद में नहीं देखता हूँ। -वीरेंद्र "अजनबी"