कौन संजोता है दिल में रिश्तों की लाश को, उनको दफ़ना देने की ज़रा ज़हमत कीजिये। कब हुए हैं मुर्दे ज़िंदा, ऐ "अजनबी", रिश्तों को फ़रिश्तों का दर्जा मत दीजिए। -वीरेंद्र "अजनबी"
कोई उसकी नफ़रतों का गिला क्या करे, मुहब्बतों से जिसका कोई वास्ता रहा नहीं। ख़ामोशियाँ ही बेहतर हैं अब तो उसकी, जिसकी ज़ुबान का कोई भरोसा रहा नहीं। -वीरेंद्र "अजनबी"
जवानी की सही कद्र बुढ़ापे में होती है, रिश्तों की कद्र रिश्ते ख़त्म जाने पे होती है। घमंडी का घमंड तोड़ना आसान नहीं है, यह ताक़त तो सिर्फ़ आईने में होती है। -वीरेंद्र "अजनबी"