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Showing posts from October, 2025

कि-017 कौन संजोता है दिल मे

कौन संजोता है दिल में रिश्तों की लाश को, उनको दफ़ना देने की ज़रा ज़हमत कीजिये। कब हुए हैं मुर्दे ज़िंदा, ऐ "अजनबी", रिश्तों को फ़रिश्तों का दर्जा मत दीजिए। -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-067 तहैया करके बैठे हैं

तहैया करके बैठे हैं जो हमे बर्बाद करने का, "अजनबी" वो जानलें हम वो फूल हैं जो मुरझाने पर और महकते हैं। -वीरेंड "अजनबी"

शे-066 कुछ लोग9न को

कुछ लोगों को जितना दूर से देखो, वो  बहुत अच्छे लगते हैं, हक़ीक़तों में तो हैं वो शातिर, मगर तस्वीरों में भोले लगते हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-018 कोई उसकी नफरतों

कोई उसकी नफ़रतों का गिला क्या करे, मुहब्बतों से जिसका कोई वास्ता रहा नहीं। ख़ामोशियाँ ही बेहतर हैं अब तो उसकी, जिसकी ज़ुबान का कोई भरोसा रहा नहीं। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-011 सोचो अगर आईना

सोचो अगर आईना दिखाने वाला कोई न हो, तो लोग अपने बारे में कुछ जान ही न पाएँगे।  -वीरेंद्र "अजनबी" 

शे-065 आंधी तूफान भी

आंधी तूफाँ भी सर झुकाए निकल जाते हैं, बुझा सका है कौन चिरागे-मुहब्बत को।  -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-064 ज़िंदगी से तेरी

ज़िंदगी से तेरी हम भी चले जाते हैं, "अजनबी", आखिर चराग़ भी तो घर रौशन करके बुझ जाते हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-017 ज़िंदगी मे जो किसी

ज़िंदगी मे जो किसी का नहीं, दुनियां में कोई उसका भी नहीं। गैरों का वो क्या होगा "अजनबी" जो ख़ुद भी ख़ुद का नहीं। -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-063 तुम्हारी तरह अब मैं भी

तुम्हारी तरह अब मैं भी भूल गया हूँ तुम्हे, मुझे भी अब बस तुम्हारी यादें ही पसंद हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"

कि-016 सिर्फ़ दरीचों से

सिर्फ़ दरीचों से काम न चलाओ, बंद ना रखा करो मुकम्मल दरवाज़े। आमोदरफ़्त बनाये रक्खो जनाब, अच्छे नहीं होते मुक़फ़्फ़ल दरवाज़े। -वीरेंद्र "अजनबी"

कि-015 जवानी की कद्र

जवानी की सही कद्र बुढ़ापे में होती है, रिश्तों की कद्र रिश्ते ख़त्म जाने पे होती है। घमंडी का घमंड तोड़ना आसान नहीं है, यह ताक़त तो सिर्फ़ आईने में होती है। -वीरेंद्र "अजनबी"