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Showing posts from March, 2025

शे-043 सारे जहां को

सारे जहां को आप दोस्त बना नहीं सकते, इसलिए हर किसी से उम्मीदे-वफ़ा बेकार है। -वीरेंद्र "अजनबी"

कि-012 आप अपनी बदकिस्मती

आप अपनी बदकिस्मती से लड़ नहीं सकते, इसलिए उस पर रोना-धोना बेकार है। दग़ाबाज़ को तुम भरोसेमंद बना नहीं सकते, इसलिए उससे कोई गिला-शिकवा बेकार है। सारे जहां को हमदर्द दोस्त बना नहीं सकते, इसलिए हर किसी से उम्मीदे-वफ़ा बेकार है। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

मु-012 सभी कुछ जायज़ है

सभी कुछ जायज़ है, इंसाँन चाहे जो करे। गिर जाए कितना भी, इंसानियत से न गिरे। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

पं-004 भले झूंटी कसम

भले झूंटी कसम खाओ हमारी, हमे ऐतराज नहीं, ये तसल्ली क्या कम है कसम हमारी ही खाते हो। -वीरेंद्र "अजनबी"

क-002 कविता अभिव्यक्ति है

कविता अभिव्यक्ति है भावनाओं की, संवेदनाओं की, कामनाओं की, कल्पनाओं की, वेदनाओं की, व्यथाओं की। इसे परिभाषित न करो इसको बंदिशों में न बांधो कवि के मनोभाव को देखो परिवेश को भी समझो। कविता परिणीति है, कविता अभिव्यक्ति है, स्वप्न श्रृंखलाओं की, प्रेमी-प्रेमिकाओं की। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

शे-042 तुम तो यूंही उदास

तुम तो यूंही उदास हो गए हो इस फ़ौरी अंधेरे से, हमें देखो मायूस ज़िंदगी को गुज़ारा खिले चेहरे से। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

मु-011 कभी देखे ख्वाब

कभी देखे ख्वाब  पर टूट गए, फिर देखे,  मगर फिर टूट गए, यूंही चला सिलसिला ता-उम्र, अब नींद उड़ गई, हम टूट गए। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

शे-041 वो शख्स पास था

वो शख़्स पास था ज़रूर,पर मेरा था ही नहीं। चला गया, तो चला गया, वो मेरा था ही नहीं। -वीरेंद्र "अजनबी"  🆚

शे-040 हमने देख ली सब

हमने देख ली सब यारों की यारी, सभी निकले सेल्फ़ीश बारी-बारी। -वीरेंद्र "अजनबी"  -🆚

त्रि-003 उसे फितरतन दर्द

उसे फ़ितरतन दर्द देना ही था, फिर मैं क्या, और कोई क्या, जो शिकार हो गया, वो कुछ नहीं, एक बदनसीब के सिवा  फिर उससे किसी को काहे का गिला काहे का शिकवा!! -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

पं-004 जब नफ़रत अंकुरित

जब नफ़रत अंकुरित हो जाए, तो वहां प्यार कभी नहीं उगता। वीरेंद्र "अजनबी" -🆚

शे-039 आवाज़ उनको दी जाती

आवाज़ उनको दी जाती है जो दूर होते हैं, उनको क्या आवाज़ देनी जो दिल मे रहते हैं। वीरेंद्र "अजनबी" -🆚

शे-038 कोई लम्हा नहीं ऐसा

कोई लम्हा नहीं ऐसा कि तुम पास न होते हों, कोई सांस नहीं आती जिसमे आप न होते हों। वीरेंद्र "अजनबी" -🆚

मु-011 किनारा भले ही

किनारा भले ही कर ले 'वो', पर बात उससे अब भी होती है। पहले होती थी दोनों तरफ से, अब बस इकतरफ़ा ही होती है। -वीरेंद्र "अजनबी"  -🆚