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Showing posts from February, 2025

शे-037 अबतो मन भर चला है

अबतो मन भर चला है, चलो कुछ तोहमतें लगा देते हैं, मुंह पे ही सच बोल देता है आईना चलो इसे हटा देते हैं। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

शे-036 ज़माने को नीचा

ज़ माने को नीचा देखते हैं जो, वो आईना देखना भूल जाते हैं। -वीरेन्द्र "अजनबी" 🆚

शे-035 मैं फिर से जीने

मैं फिर से जीने की कोशिश कर रहा हूँ । थोड़ा-थोड़ा हंसने की प्रैक्टिस कर रहा हूँ। -वीरेंद्र "अजनबी" 🆚

कि-011 "शूलों" को शूल की

"शूलों" को शूल की तरह चुभ गए हम। बेकसूर होके भी सूली पर चढ़ गए हम। लो अब देखते रहना इसमे मुंह अपना, ऐसा आईना तुम्हारे वास्ते रख गए हम। -वीरेंद्र  "अजनबी" 🆚

शे-034 दिल को अब

दिल को अब दर्द के बगैर सुकूँ ज़रा नहीं मिलता, रहता है बेचैन गर इसे कोई दर्द नया नहीं मिलता। -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-033 किसी तांत्रिक

किसी तांत्रिक ने आज हमको यह बतलाया है, हम भूल रहे हैं जिसको, हमपे उसी का साया है। -वीरेंद्र "अजनबी" (🆚)

शे-032 इंसाँ न तो पत्थर

इंसाँन तो पत्थर बन भी सकता है, मगर पत्थर को इंसाँ कौन बनाए ? -वीरेंद्र "अजनबी" (🆚)

मु-010 गर तुम बदले

गर तुम बदले न होते, सपने बिखरे न होते, फ़ासले कभी होते नहीं, हम तुम जुदा न होते। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-002 छीन लिया तूने

छीन लिया तूने सुकून मेरा, बता अब तो तू खुश है ना? -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-031 निराला था गुनाह

निराला था गुनाह मेरा, निराली सज़ा मिली है, मांगी तो थी ज़िंदगी मैंने, मगर क़ज़ा मिली है। -वीरेंद्र "अजनबी"

पं-001खुश वही है

ख़ुश वही है, जो भावुक नहीं है! -🆚

शे-030 दूर की नज़र

दूर की नज़र खराब होने पर भी  दूर की सोच कभी बाधित नहीं होती। -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-029 आंखें कितनी भी

आंखें कितनी भी कमज़ोर क्यों न हों, आदमी को पहचानने में गलती नहीं करतीं। -वीरेंद्र "अजनबी"

मु-009 जिन लोगों के

जिन लोगों के सपने बड़े होते हैं, वो सुबाह  देर से सोके उठते हैं। वो सपनों को अधूरा नहीं छोड़ते, सपनों को पूरा करके उठते हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"👁️😜

कि-010 मुझे ग़म तेरे

मुझे ग़म तेरे बदलने का नहीं, एक जैसी रहती दुनिया नहीं, ग़म तो रहा बस इस बात का, तुझे बदलने में वक्त लगा नहीं। -वीरेंद्र "अजनबी" (🆚)

कि-009 तेरे बगैर ये दुनियां

तेरे बगैर ये दुनियां हम कब की छोड़ देते, मगर, ये तेरे 'हमशक्ल' मरने भी नहीं देते। जगा देते हैं फिर वही जज़्बातो- ख़्यालात, तू नहीं है मेरी ज़िंदगी मे, मानने ही नहीं देते। -वीरेंद्र "अजनबी"

शे-028 अंदेशा तो था

अंदेशा तो था मुझे, मौसम के बदल जाने का, पर इल्म न था मौका भी न मिलेगा संभल जाने का। -वीरेंद्र "अजनबी" (🆚)