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Showing posts from June, 2024

मु-004 SARHAD के पार

SARHAD के उस पार छुपा रहता है कोई, हदें पार करने से मुझे रोकता रहता है कोई, हवाओं की, घटाओं की कहाँ होती है सरहद, मुझपे ही क्यों अंकुश लगाता रहता है कोई। -वीरेंद्र "अजनबी" मु-004

मु-003 मैं कितना "अजनबी" हूँ

मैं कितना "अजनबी" हूँ, ज़िंदगी भी मुझे पहचानती नहीं। देता हूँ सबूत अपने होने का, कोई सबूत मगर वो मानती नहीं। -वीरेंद्र "अजनबी" मु-003

मु-002 आप शाख़ हैं

आप शाख़ हैं और पत्ते हम हैं कल सूख जाएंगे आज हरे हम हैं, शाख़ से जुदा होना नसीब हमारा, पतझड़ आते ही नीचे गिरते हम हैं। -वीरेंद्र "अजनबी"  मु-002

मु-001क्यों डरता हूँ

क्यों डरता हूँ मैं तुम्हे खोने से, जबकि मैंने तुम्हे पाया ही नहीं? तुम क्या जानो विरह की पीड़ा, अभी तुमने मुझे खोया ही नहीं? "वीरेंद्र अजनबी"

शे-001 न सिखाओ तमीज़

न सिखाओ तमीज़ अधेड़ों को वो तुमको ही झाड़ देंगे, जैसे आधी गुज़ार दी उन्होंने बाकी भी यूं ही गुज़ार देंगे। -वीरेंद्र अजनबी

क--001 भावनाएं होतीं तो बहुत

भावनाएं होतीं तो बहुत प्यारी हैं। अक्सर लगती भी बड़ी दुलारी हैं। मगर एक बड़ी सी कमी है उनमें, वो बड़ी दुर्लभ हैं,  जहां हैं भी, वहां अस्थायी हैं।  आती हैं, गायब भी जल्दी हो जाती हैं, किसी के पास टिकती ही नहीं, और किसी के पास तो होती ही नहीं। भावनाओं के लोग कद्रदान भी हैं, और इनसे लोग परेशान भी हैं। कभी कोमल होती हैं भावनाएं, कभी स्वयं के लिए बन जाती हैं यातनाएं। इंसाँ को ये कभी महान बना देती हैं, तो कभी पश्चाताप में डुबा देती हैं। भावनाओं से इंसाँ आबाद भी हो जाता है, और कभी स्वयं बर्बाद भी हो जाता है। आधुनिक युग मे इनका विसर्जन ही अच्छा। -वीरेंद्र "अजनबी (5.6.24)