भावनाएं होतीं तो बहुत प्यारी हैं। अक्सर लगती भी बड़ी दुलारी हैं। मगर एक बड़ी सी कमी है उनमें, वो बड़ी दुर्लभ हैं, जहां हैं भी, वहां अस्थायी हैं। आती हैं, गायब भी जल्दी हो जाती हैं, किसी के पास टिकती ही नहीं, और किसी के पास तो होती ही नहीं। भावनाओं के लोग कद्रदान भी हैं, और इनसे लोग परेशान भी हैं। कभी कोमल होती हैं भावनाएं, कभी स्वयं के लिए बन जाती हैं यातनाएं। इंसाँ को ये कभी महान बना देती हैं, तो कभी पश्चाताप में डुबा देती हैं। भावनाओं से इंसाँ आबाद भी हो जाता है, और कभी स्वयं बर्बाद भी हो जाता है। आधुनिक युग मे इनका विसर्जन ही अच्छा। -वीरेंद्र "अजनबी (5.6.24)