शे–070 ज़िंदगी मे घाटा

ज़िंदगी मे घाटा उठाना तो मुझे लाज़िम था,
क्योंकि रिश्तों को मैंने कभी तौला ही नहीं।

-वीरेंद्र "अजनबी"

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